विज्ञापन और लोकतंत्र

आज हम चारों ओर से विज्ञापनों (advertisement) से घिरे हुए हैं। हम इन्हें टेलीविजन पर देखते हैं, रेडियो पर सुनते हैं, सड़कों पर देखते हैं और समाचारपत्र और पत्रिकाओं में पढ़ते हैं। जब हम internet पर विभिन्न websites देख रहे होते हैं, ये बीच-बीच में आते रहते हैं।

विज्ञापन हमारा ध्यान विभिन्न प्रकार के उत्पादों की ओर आकर्षित करते हैं और उनका सकारात्मक वर्णन करते हैं, जिससे हम उन्हें खरीदने में रुचि लेने लगते हैं। हम विज्ञापन देखते हैं, उनके बारे में चर्चा करते हैं और प्रायः लोगों का आकलन उनके द्वारा प्रयोग में लाए जा रहे ब्रांड उत्पादों के आधाार पर करते हैं। 

कुल मिला कर कहा जाए तो गलत नहीं होगा की विज्ञापन हमारे जीवन को प्रभावित करने के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। पर क्या आपने एक लोकतंत्रीय समाज और विज्ञापन को जोड़ कर देखा है।



किसी उत्पाद के विज्ञापन में बहुत पैसा लगता है। प्रायः एक brand के विज्ञापन में करोड़ों रुपए ख़र्च हो जाते हैं। विज्ञापन बनाना और उन्हें मीडिया में दिखाना बहुत महँगा है, क्योंकि आजकल बाजार में बहुत सारे विज्ञापन हैं। इसीलिए कंपनियों को अपने विज्ञापन बार-बार दिखाने पड़ते हैं, जिससे वे लोगों के दिमाग में

बैठ जाएँ।


इसका सामान्य अर्थ यही है कि केवल बड़ी-बड़ी कंपनियाँ ही विज्ञापन दे सकती हैं। यदि आपका व्यापार छोटा है, तो आपके पास इतना पैसा ही नहीं होगा कि आप अपने उत्पाद का विज्ञापन टी-वी- या राष्ट्रीय स्तर के समाचारपत्रें और पत्रिकाओं में दे सकें। इसीलिए लोगों द्वारा घर पर बनाकर बेचे जाने वाले पापड़, अचार, मिठाइयाँ और जैम आदि वैसे फैशनेबल नहीं समझे जाते हैं, जैसे कि ब्रांडेड उत्पाद (branded product)। उन्हें प्रायः अपनी चीजें साप्ताहिक बाजार या आस-पास की दुकानों को बेचनी पड़ती हैं।


विज्ञापन हमको यह भी विश्वास दिलाने लगता है कि पैकेट में बंद ब्रांड नामों वाली वस्तुएँ पैकिंग के बिना आने वाली वस्तुओं से बेहतर हैं। हम यह भूल जाते हैं कि उत्पाद की गुणवत्ता का उसकी पैकिंग से कोई खास संबंध नहीं है। लोगों के पैकिग युक्त उत्पादों की ओर आकर्षित होने से बहुत से छोटे-छोटे व्यवसायी नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं और अपनी जीविका छोड़ने को विवश हो जाते हैं।

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लोकतंत्र में जहाँ सब लोग समान हैं और जहाँ सभी को सम्माननीय जीवन जीने योग्य अवसर मिलने चाहिए, वहाँ विज्ञापन गरीबों के सम्मान में एक प्रकार की कमी जरूर करते हैं। उनके चेहरे विज्ञापनों में नहीं दिखाए जाते हैं और इसीलिए हम उनके जीवन को कोई महत्त्व नहीं देते। विज्ञापन लोगों की निजी भावनाओं को पुकारता है। इसीलिए कई बार जब लोग वह विज्ञापित वस्तु नहीं खरीद पाते है, तब उन्हें बुरा लगता है। उन्हें महसूस होता है कि वे अपने प्रिय लोगों का वैसा ख्याल रखने में असमर्थ हैं, जैसा विज्ञापन में दिखाई पड़ रहा है।


विज्ञापन धनी और प्रसिद्ध लोगों पर हमारा ध्यान केंद्रित करके हमें गरीबी, भेदभाव और आत्मसम्मान आदि बातों के बारे में सोचने से दूर कर देते हैं, जिनका सामना किए बिना लोकतंत्र में समानता स्थापित नहीं हो सकती है। 

लोकतंत्रीय समाज का नागरिक होने के नाते हमें अपने जीवन पर विज्ञापनों से पड़ने वाले सशक्त प्रभाव के बारे में सजग रहना जरूरी है। विज्ञापन क्या करते हैं, इसके बारे में तर्कों के साथ सोचने के बाद हम बेहतर निर्णय ले सकेंगे कि हमें कोई वस्तु खरीदनी है या नहीं।



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